जम्मू की जगती कॉलोनी में कश्मीरी पंडित विस्थापित परिवार बारिश के मौसम में बिजली चालू करने से डरते हैं। छत और दीवारों से पानी रिसने के कारण करंट लगने का खतरा बना रहता है। एक परिवार की महिला को पहले ही करंट लग चुका है और वह बाल-बाल बची थीं। कई लोग सामान बचाने के लिए प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल कर रहे हैं।
2010 में बने करीब 4200 क्वार्टर रखरखाव के अभाव में खंडहर जैसे हो गए हैं। हजारों विस्थापित परिवार खतरे में रह रहे हैं। करोड़ों के टेंडर जारी होने के बावजूद जमीन पर मरम्मत नहीं हुई। बड़ा हादसा होने से पहले कार्रवाई की जरूरत है।
- जगती कॉलोनी जम्मू में कश्मीरी पंडित विस्थापितों के लिए 2010 में बनी थी।
- लगभग 4200 क्वार्टर हैं, जिनमें 5000 से अधिक परिवार रहते हैं।
- बारिश में छत-दीवारें गीली हो जाती हैं और करंट का खतरा बढ़ जाता है।
- एक निवासी की पत्नी को पिछले साल करंट लगा; परिवार अब बरसात में स्विच नहीं छूता।
- ग्राउंड फ्लोर तक ऊपर से रिसता पानी पहुंच रहा है।
- कुछ क्वार्टरों की आखिरी मरम्मत 2017 में बताई गई।
- करोड़ों रुपये के कई टेंडर जारी हुए, लेकिन दिखाई देने वाला काम नहीं हुआ।
जम्मू-कश्मीर में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा फासला है, इसका खौफनाक उदाहरण प्रदेश की सबसे बड़ी कश्मीरी पंडित विस्थापित कॉलोनी में देखने को मिल रहा है. साल 1990 में कश्मीर घाटी से विस्थापित होकर आए कश्मीरी पंडितों के लिए बनाई गई 'जगती कॉलोनी' आज सरकारी नजरअंदाजगी का सबसे बड़ा स्मारक बन चुकी है. हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि बरसात के दिनों में यहां रह रहे हजारों लोग करंट लगने के खौफ से अपने घरों की बिजली तक ऑन नहीं कर पाते हैं. जम्मू की इस जगती कॉलोनी में करीब 4200 क्वार्टर हैं,